सभी जानते है कि पृथ्वी पर जीव कर्म करता और सभी प्रकार के कर्मफलों को भोगता भी है इसका सीधा अर्थ यह है कि जीव पर पृथ्वी का प्रभाव सबसे अधिक है | प्राय: यह भी कहा जाता है कि आत्मा मनुष्य जन्म सहित चौरासी लाख प्रकार के जन्म लेती है और इन सभी योनियों का वर्णन पृथ्वी पर ही है | प्रेतबाधा और ग्रहचाल, दोनों भिन्न भिन्न विषय है |

ऐसा एक भी लिखित या मौखिक प्रमाण नहीं है जिससे यह निश्चित हो कि आत्मा किसी अन्य ग्रह पर जाकर कोई जन्म लेती है और फिर पृथ्वी पर आकर मनुष्य जन्म लेती है | यह भी सभी जानते है कि मृत्यु के बाद आत्मा ही प्रेतात्मा बनती है और बुरी नज़र, टोने-टोटके और प्रेतबाधा पृथ्वी पर रहने वाले जीवों को ही होती है |

इसका सीधा अर्थ यह है कि बुरी नज़र, टोने-टोटकों, नकारात्मकता और प्रेत बाधा का सम्बन्ध केवल पृथ्वी से है | यह स्पष्ट है कि प्रेत किसी अन्य ग्रह से नहीं आते है इसलिए प्रेत बाधा के लिए पृथ्वी के अतिरिक्त ग्रहों की गणना करना उचित नहीं है | पृथ्वी पर ही प्रेत बाधा के लिए क्रियाएं होती है उसके लिए किसी अन्य ग्रह पर नहीं जाना पड़ता है |

जो लोग जन्मकुंडली देखना जानते है वह ग्रहों की गणना करते समय सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहू और केतू की गणना तो करते है परन्तु पृथ्वी की गणना नहीं करते है जिसके कारण उनकी भविष्यवाणी गलत होती है | जीव पर पृथ्वी के सबसे अधिक प्रभाव को अनदेखा करना, गंभीर गणना-दोष है |

हर कर्मफल के लिए जीव पर पृथ्वी का बहुत अधिक प्रभाव होता है | यह गणना करना अति आवश्यक है कि जीव कौन सा कर्म कर रहा है या कौन सा कर्मफल भोग रहा है | जैसे व्यक्ति कार्यस्थल पर है, शयन कक्ष में है, रसोई में है, बाथरूम में है, अस्पताल में है, शमशानघाट में है, सड़क पर है, सत्संग में है, शराबखाने में है इत्यादि |

सभी ग्रहों के साथ पृथ्वी की गणना नहीं करने का अर्थ है कि आप जिस घर में रहते हो उसके बारे में ना सोच कर पड़ोसियों के घर का हिसाब लगाकर दुखी होते रहते हो | पृथ्वी से दूर के सभी ग्रहों  की गणना कर ली लेकिन जिस पर रहते हो उसका सोचा तक नहीं | यदि पृथ्वी की गणना करनी आ जाये तो सभी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों की गणना करनी आ जाती है |

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